दो दशक

हम मिले ज़िन्दगी के उस मोड़ पर फिर से,
जहाँ तुम उतने ही साधारण थे जितनी की मैं ,
एक मार्गदर्शक, एक हमसफ़र के चेहरों से छुपे,
अपने आगे अपनो के सुख दुःख को जीते हुए।

ये अच्छा हुआ कि हम मिले फिर से ,
सदियों बाद ही सही पर मिले तो सही ।
वक़्त की धूल से परे था जो रिश्ता ,
वक़्त देकर उसे नया रंग दिया तो सही।

हाँ , वैसे नहीं जैसे मिला करते थे पहले,
दो दोस्तो की तरह ,बस- मैं और तुम,
अपने दायरों में ज़िन्दगी के मायने तलाशते ,
जिनका कोई माझी न था, न मानी था कोई.

हम मिले ज़िन्दगी के उस मोड़ पर फिर से,
जहाँ तुम उतने ही साधारण थे जितनी की मैं ,
एक मार्गदर्शक, एक हमसफ़र के चेहरों से छुपे,
अपने आगे अपनो के सुख दुःख को जीते हुए।

तुम्हारी खामोश बेचैनी आज भी बोलती है,
मेरे सतही शब्दों में सागर खोज लेते हो तुम ।
तुम्हारे साथ मैं फिर सत्रह की बन जाती हूँ,
वक़्त की शाख गिरने से रोक लेते हो तुम.

वो तूफ़ान तुम्हारे चेहरे के पीछे देखा था पहले,
धीमे धीमे आज भी वो दरिया बन के बहता है.
जो मेरे अनगिनत सवालों से गुज़रा था कभी.
वो उफान सोयी ज्वालामुखी बन धधक रहा है।

 

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
मै बेवजह गर रूठ जाऊ तुमसे
जान बेवजह फ़िर भी मना लो तुम
बेबात बेकरारी चुभती है दिल मे

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
मै गर बेबात जो सताऊ कभी
तुम हाथ पकड आन्खो से छेडो
और मै सिमट खो जाऊ खुद मे

तेरा हो कर भी न होना है जैसे
बारिश की सूखी बून्द हो कोई
बेवजह रिश्ता तय जो किया था
जीने की वजह ढून्ढती हू तुम मे

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
बातो की गन्गा मे दोनो बह जाये
खामोशी के दायरे न निगल पाये
और ये रिश्ता डुबा के उबारे हमे

फ़ुर्सत – रविवार

फ़ुर्सत ने दस्तक दी आज रविवार के दिन
पुरानी यादो का बस्ता बोझे मे था लाया
बुझे लम्हो की धूल हटा के अन्दर झान्का
हमारे रिश्ते का बहिखाता पहले हाथ आया

पुरानी आदत है हिसाब शुरु से बान्चती हू मै
पीले पडे पहले पन्ने पे जा हाथ थम सा गया
सिरहन हुई, छू के जगा गया सोये दिल को
लम्स उस पहली मुलाक़ात का दर्ज था वहाँ

कितना मासूम था तेरा मेरा रिश्ता तब, मन्नू
गुलाब की अनछुई अधखिली कली की तरह
न रिश्ते थे न नाते थे और न कोई गुस्ताख पल
तुम से शुरू मुझ पर सिमटता था दायरा अपना

आखिर ज़माने की रीत ने दिया हमको मिला
पन्ने पलटती रही,हर्फ़ बढते,चाहते घटती रही
दुनिया,रुतबा,शौहरत,पैसे से पीछे रह गयी मै
साथ साथ थे पर फ़ासले बढ गये थे दरमिया’

पुरानी आदत है मुड के कल देखती नही कभी
फ़ुर्सत को माज़ी के हवाले कर आज को कहा
कह दो,सोना ने कहा है मन्नू घर जल्दी आये
आज रविवार हैHate Story दिखाने ले जायें ।

हरसिन्गार के फ़ूल

ज़िन्दगी रेत के टीलो की गुलाम है अब
जो महकती थी फ़िज़ा मे कभी दुआ बन
कभी हरसिन्गार के फ़ूल सजा तन मन
धूल मे सनी है वादिया ख्वाबो की अब

आन्धिया चलती है बैरागी बन आजकल
तुम नज़र आ कर भी दिखाई नही देते
कानो तक आ रुक जाती है कुछ सदाए
लफ़्ज़ हो जैसे तुम्हारे पर सुनाई नही देते

रेगिस्तान सा बन्जर उदास दिल हो गया है
केक्टस उग आये है सूखे मन की सतह पर
एक रुकी चीख बन के अटक पडे है मिसरे
मन्न को झिन्झोड कहानी बनके नही बहते

तुम ग्यान की एक बून्द बन बरस जाओ न
भूल गयी लिखना आओ फिर सिखलाओ न
अलफ़ बे पे के कसीदे चलो फिर से पड ले
तख्ती साफ़ है ,मिल कर एक कहानी रच ले

सुकून मिले मुझे थोडा,पलको पे नीन्द सजाऊ
मन्न मे उछलते खयालो को कोई लोरी सुनाऊ
वक़्त की आन्धी शायद नाराज़ हो लौट जाये
धूलित अल्फ़ाज़ सावन के पपीहे से चहक जाये

और महक जाये अल्फ़ाज़ से फिर ज़िन्दगी ये मेरी
जी जाऊ और मै एक सदी ओस की बून्द बन कर

वजूद

वजूद

चलते रहना तेरी फितरत में है
ये जानती हूँ मैं जानम कबसे
फिर भी साया बन चल पड़ती हूँ
तेरी बेरुखी की धूप के पीछे पीछे

तपिश में झुलस कर रुसवाईयो की
तेरी बे इनायती से बेजार हो रही हूँ
दिल-ऐ-बेदर्द से शिकवा कर के देखो
टूटे अरमानो का बाज़ार बन गयी हूँ

कभी तुम बे आदतन रुख से पलट जाओ
वक़्त की रेत पर लिखे कल पे पड़ लेना
बीते लम्हो की सीली रेखाए नज़र आएँगी
मेरी वफ़ा की याद तेरे वजूद को सताएंगी

तेरे वजूद से खुद को जुदा करके जानम
सायो की दुनिया से रुखसत हो रही हूँ
तेरे खयालो की धुन्द में जो खो गया था
उस अक्स को पोशीदा से रिहा कर रही हूँ

तुझ को खो,खुद को पा ,अपनी बंदगी रही हूँ

एक अजनबी की तरह

अपने ही शहर मे आये है
एक अजनबी की तरह
दबे कदमो का बोझा लिये
तेरी आहट ने भी पराया
कर दिया था यहा हमको

तू वो रहनुमा नही जिसे
मेरी निगाह तलाशे सदा
फिर क्यू दोबारा तेरी ही
चौखट पे ला खडा कर
रुसवा कर दिया हमको

सान्से चलती है अबतक
राते देर तक सुलगती है
ये ज़िन्दगी शौक नही है
बुझता जुनून है अबतक
पर सर्द आहे बुझी नही है

सिर्फ़ यादो की राख है
नासूर बन के ज़िन्दा है ।

सूखी बाओली ,अन्धेरी गहरी

तुम्हारे दिल तक जाता हर रस्ता
तन्ग दरीचो से गुज़र निकलता है
कुछ बन्द दरवाज़े दरमिया आते है
खयालो पे हर वक़्त पहरा रह्ता है

उम्मीद की नन्ही किरन का टीका
सहेज सर माथे पे क्या लगा पाओगे
मै उफ़नता ,उमडता प्रेम दरिया हू
तन्ग गलियो मे क्या बसा पाओगे

सब से छुप के गमो की चादर ओडे
बयाबान मे अकेले थे तुम अब तक
डर है तेरे दिल के डूबने उबरने तक
भूलभुलैया मे न खो जाये उदास मन

हज़ार कोने है तेरे दिल की गहराई मे
और तुम सूखी बाओली,अन्धेरी गहरी