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स्वतंत्रता दिवस -एक लघु कथा

दीपू आज बहुत खुश था .इतना खुश कि ख़ुशी के मारे पूरी रात आँखों ही आँखों में काटी थी, बस कब सुबह हो और उसका ख्वाब पूरा हो!  कल १५ अगस्त जो है . बापू ने उसे वादा किया था … पढना जारी रखे

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दो दशक

हम मिले ज़िन्दगी के उस मोड़ पर फिर से,
जहाँ तुम उतने ही साधारण थे जितनी की मैं ,
एक मार्गदर्शक, एक हमसफ़र के चेहरों से छुपे,
अपने आगे अपनो के सुख दुःख को जीते हुए। पढना जारी रखे

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क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू मै बेवजह गर रूठ जाऊ तुमसे जान बेवजह फ़िर भी मना लो तुम बेबात बेकरारी चुभती है दिल मे क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू मै गर बेबात जो सताऊ कभी तुम हाथ पकड … पढना जारी रखे

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फ़ुर्सत – रविवार

फ़ुर्सत ने दस्तक दी आज रविवार के दिन पुरानी यादो का बस्ता बोझे मे था लाया बुझे लम्हो की धूल हटा के अन्दर झान्का हमारे रिश्ते का बहिखाता पहले हाथ आया पुरानी आदत है हिसाब शुरु से बान्चती हू मै … पढना जारी रखे

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हरसिन्गार के फ़ूल

ज़िन्दगी रेत के टीलो की गुलाम है अब जो महकती थी फ़िज़ा मे कभी दुआ बन कभी हरसिन्गार के फ़ूल सजा तन मन धूल मे सनी है वादिया ख्वाबो की अब आन्धिया चलती है बैरागी बन आजकल तुम नज़र आ … पढना जारी रखे

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वजूद

वजूद चलते रहना तेरी फितरत में है ये जानती हूँ मैं जानम कबसे फिर भी साया बन चल पड़ती हूँ तेरी बेरुखी की धूप के पीछे पीछे तपिश में झुलस कर रुसवाईयो की तेरी बे इनायती से बेजार हो रही … पढना जारी रखे

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एक अजनबी की तरह

अपने ही शहर मे आये है एक अजनबी की तरह दबे कदमो का बोझा लिये तेरी आहट ने भी पराया कर दिया था यहा हमको तू वो रहनुमा नही जिसे मेरी निगाह तलाशे सदा फिर क्यू दोबारा तेरी ही चौखट … पढना जारी रखे

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