विशेष रुप से प्रदर्शित

नया साल

दिन फिर वही होंगे और वही होगी रात,
कुछ कच्चे बे-लम्स, कुछ गहरे जज़्बात।

हैरान कर जाएगा ज़माना किसी रोज़,
चैन ले जाएगा करके किसदिन मधहोश।

फिर दिल टूटेंगे ,फिर होगा बेहद मलाल,
पर फिर भी मुबारक हो तुमको नया साल.

एक हर्फ़ एक सिफर से एक ऊपर बुना,
एक पुराना तन पहने नया उजला लिबास.

वक्त किसका हुआ बोलो ...

 

नीम

थोड़ी कड़वा हो रही हूँ। शायद नीम हो गयी हूँ !

चबाकर थूकी गयी इतनी बार कि महीन हो गयी हूँ।

बीमार की तामीर करते- करते गमगीन हो गयी हूँ!

खून सुर्ख पाक किये इतने कि दागदार हुआ दामन।

थोड़ी-थोड़ी कड़वा हो रही हूँ। शायद नीम हो गयी हूँ !

(अब कहोगे तुम नीम- हकीम खतरा-ए-जान !)

(जाग ऐ ज़मीर, अब तो कर अपनी असल पहचान !)

 

जन्माष्टमी के दिन

जन्माष्टमी के दिन
नवशिशु कान्हा को
दूध से नहलाते हैं,
नये वस्त्र पहनाकर
सोलह श्रंृगार किये
नयी राधा रानी के संग
झूले पर सजाते हैं ।

झांकियाँ निकलती हैं,
ढोल मंजीरों के बीच
कान्हा कान्हा की
हूंकार से गुज़र
हर मूरत नवरत्न सी
चम चम चमकती है।

साल बीत जाता है,
टूटे सितारों वाले
राधा कृष्ण को
श्रधापूर्वक ,हाथ जोड़े
मिट्टी के माधव संग
पीपल के नीचे
पार्क में चुपचाप
छोड़ आते हैं।

अगली जन्माष्टमी फिर
एक नया कृष्ण सजाते हैं ।
एक नयी मूरत प्रेमपूर्वक
घर ले आते हैं ।

….आज शाम की सैर के वक्त पार्क में कान्हा जी से हुई मुलाकात का किस्सा ।

दो दशक

हम मिले ज़िन्दगी के उस मोड़ पर फिर से,
जहाँ तुम उतने ही साधारण थे जितनी की मैं ,
एक मार्गदर्शक, एक हमसफ़र के चेहरों से छुपे,
अपने आगे अपनो के सुख दुःख को जीते हुए।

ये अच्छा हुआ कि हम मिले फिर से ,
सदियों बाद ही सही पर मिले तो सही ।
वक़्त की धूल से परे था जो रिश्ता ,
वक़्त देकर उसे नया रंग दिया तो सही।

हाँ , वैसे नहीं जैसे मिला करते थे पहले,
दो दोस्तो की तरह ,बस- मैं और तुम,
अपने दायरों में ज़िन्दगी के मायने तलाशते ,
जिनका कोई माझी न था, न मानी था कोई.

हम मिले ज़िन्दगी के उस मोड़ पर फिर से,
जहाँ तुम उतने ही साधारण थे जितनी की मैं ,
एक मार्गदर्शक, एक हमसफ़र के चेहरों से छुपे,
अपने आगे अपनो के सुख दुःख को जीते हुए।

तुम्हारी खामोश बेचैनी आज भी बोलती है,
मेरे सतही शब्दों में सागर खोज लेते हो तुम ।
तुम्हारे साथ मैं फिर सत्रह की बन जाती हूँ,
वक़्त की शाख गिरने से रोक लेते हो तुम.

वो तूफ़ान तुम्हारे चेहरे के पीछे देखा था पहले,
धीमे धीमे आज भी वो दरिया बन के बहता है.
जो मेरे अनगिनत सवालों से गुज़रा था कभी.
वो उफान सोयी ज्वालामुखी बन धधक रहा है।

 

नेता जी कहैं

प्रेस  के कैमरों की चुंधियाती रौशनी में,
बंद आँखें एडजस्ट करते नेताजी बोले –

“कम सवाल करना इंसानियत के नाते ,
मन व्यथित है आज, शब्द मौन है सारे। ”

दुखद खबर है फिर सूखा पडा देहात में,
पीने को पानी नहीं, चूल्हे पडे हैं राख में.

अजब हाल है मेरे आंसू फिसल रहे हैं ,
और सीने में धधकते कोयले जल रहे हैं।

दिल करता है कि मैं फांसी चढ़ जाऊं ,
किसानो के दुःख में मरके सोग मनाऊँ । ”

झुकी गर्दन ने ऐसा ज़ोर का बल खाया,
सेक्रेटरी ने लपक झपक के हाथ बढ़ाया।

गिरती टोपी सर्र से सर पे वापिस आई ,
फिर नेताजी ने धीमे से आवाज़ लगायी।

“अरे भाई, ज़रा ये ऐ. सी. यहाँ घुमाना।
पांच सितारा होटल है या गुसलखाना।

पसीने से तर बतर हमारा गहरा बदन है ,
सफ़ेद कुर्ते पर काले पसीने की पहरन है।

कैसे दें सांत्वना लोगों को ऐसे हालात में ,
न आवाज़ में दम है , न चर्बी है आंत में ।

सफ़ेद मांस पर सील लगा दी माई बाप ने,
पर काले भैंसे तो बहुत फिरा करें हैं देहात में.

भारत में भूख सिर्फ इंसान को नहीं डसती,
मुर्दों की बस्ती में जनावर की भी है हस्ती ।

जाइए, नफरत की चिंगारी एक जलाइए,
फिर मिल कर हमरे साथ दावत खाइये।

वक़्त 

दाँत काटी रोटी बाँटते थे जो कल तक मिल कर,

आँख भर के अब एक दूसरे को देख नहीं सकते.

कौन कहता है वक़्त के साथ नज़रिये नहीं बदलते.