दो दशक

हम मिले ज़िन्दगी के उस मोड़ पर फिर से,
जहाँ तुम उतने ही साधारण थे जितनी की मैं ,
एक मार्गदर्शक, एक हमसफ़र के चेहरों से छुपे,
अपने आगे अपनो के सुख दुःख को जीते हुए।

ये अच्छा हुआ कि हम मिले फिर से ,
सदियों बाद ही सही पर मिले तो सही ।
वक़्त की धूल से परे था जो रिश्ता ,
वक़्त देकर उसे नया रंग दिया तो सही।

हाँ , वैसे नहीं जैसे मिला करते थे पहले,
दो दोस्तो की तरह ,बस- मैं और तुम,
अपने दायरों में ज़िन्दगी के मायने तलाशते ,
जिनका कोई माझी न था, न मानी था कोई.

हम मिले ज़िन्दगी के उस मोड़ पर फिर से,
जहाँ तुम उतने ही साधारण थे जितनी की मैं ,
एक मार्गदर्शक, एक हमसफ़र के चेहरों से छुपे,
अपने आगे अपनो के सुख दुःख को जीते हुए।

तुम्हारी खामोश बेचैनी आज भी बोलती है,
मेरे सतही शब्दों में सागर खोज लेते हो तुम ।
तुम्हारे साथ मैं फिर सत्रह की बन जाती हूँ,
वक़्त की शाख गिरने से रोक लेते हो तुम.

वो तूफ़ान तुम्हारे चेहरे के पीछे देखा था पहले,
धीमे धीमे आज भी वो दरिया बन के बहता है.
जो मेरे अनगिनत सवालों से गुज़रा था कभी.
वो उफान सोयी ज्वालामुखी बन धधक रहा है।

 

नेता जी कहैं

प्रेस  के कैमरों की चुंधियाती रौशनी में,
बंद आँखें एडजस्ट करते नेताजी बोले –

“कम सवाल करना इंसानियत के नाते ,
मन व्यथित है आज, शब्द मौन है सारे। ”

दुखद खबर है फिर सूखा पडा देहात में,
पीने को पानी नहीं, चूल्हे पडे हैं राख में.

अजब हाल है मेरे आंसू फिसल रहे हैं ,
और सीने में धधकते कोयले जल रहे हैं।

दिल करता है कि मैं फांसी चढ़ जाऊं ,
किसानो के दुःख में मरके सोग मनाऊँ । ”

झुकी गर्दन ने ऐसा ज़ोर का बल खाया,
सेक्रेटरी ने लपक झपक के हाथ बढ़ाया।

गिरती टोपी सर्र से सर पे वापिस आई ,
फिर नेताजी ने धीमे से आवाज़ लगायी।

“अरे भाई, ज़रा ये ऐ. सी. यहाँ घुमाना।
पांच सितारा होटल है या गुसलखाना।

पसीने से तर बतर हमारा गहरा बदन है ,
सफ़ेद कुर्ते पर काले पसीने की पहरन है।

कैसे दें सांत्वना लोगों को ऐसे हालात में ,
न आवाज़ में दम है , न चर्बी है आंत में ।

सफ़ेद मांस पर सील लगा दी माई बाप ने,
पर काले भैंसे तो बहुत फिरा करें हैं देहात में.

भारत में भूख सिर्फ इंसान को नहीं डसती,
मुर्दों की बस्ती में जनावर की भी है हस्ती ।

जाइए, नफरत की चिंगारी एक जलाइए,
फिर मिल कर हमरे साथ दावत खाइये।

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
मै बेवजह गर रूठ जाऊ तुमसे
जान बेवजह फ़िर भी मना लो तुम
बेबात बेकरारी चुभती है दिल मे

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
मै गर बेबात जो सताऊ कभी
तुम हाथ पकड आन्खो से छेडो
और मै सिमट खो जाऊ खुद मे

तेरा हो कर भी न होना है जैसे
बारिश की सूखी बून्द हो कोई
बेवजह रिश्ता तय जो किया था
जीने की वजह ढून्ढती हू तुम मे

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
बातो की गन्गा मे दोनो बह जाये
खामोशी के दायरे न निगल पाये
और ये रिश्ता डुबा के उबारे हमे

गुज़रा साल और तुम

तेरे आज और कल के दरमियान,
एक सदी गुज़र गयी एक साल मे.

खोल कर मुट्ठी झान्क कर देख,
पिघला दिल सोया है किस हाल मे.

जिसकी याद मे ठोकरे खायी है,
खुद से खुद का हाल छुपाते.

रुक कर मुडके एक बार न देखा,
कर जो बेहाल गया,उस ख्याल ने।

कटी पतन्ग है तू

तेरे वादे तुझसे झूठे निकले
आस्मा क्यू तुझसे प्यार करे

कटी पतन्ग है तू लापरवाह
हवा का रुख क्या इन्तज़ार करे

बादल की हो पवन बसन्ती
इठलाए,गगन भी आह भरे

बरस गया गर आस्मा रो कर
तेरी हस्ती को मिटा जायेगा

आह भर के तुझे छू जाऊन्गी
सीने मे जब धरा के समायेगा

फ़ुर्सत – रविवार

फ़ुर्सत ने दस्तक दी आज रविवार के दिन
पुरानी यादो का बस्ता बोझे मे था लाया
बुझे लम्हो की धूल हटा के अन्दर झान्का
हमारे रिश्ते का बहिखाता पहले हाथ आया

पुरानी आदत है हिसाब शुरु से बान्चती हू मै
पीले पडे पहले पन्ने पे जा हाथ थम सा गया
सिरहन हुई, छू के जगा गया सोये दिल को
लम्स उस पहली मुलाक़ात का दर्ज था वहाँ

कितना मासूम था तेरा मेरा रिश्ता तब, मन्नू
गुलाब की अनछुई अधखिली कली की तरह
न रिश्ते थे न नाते थे और न कोई गुस्ताख पल
तुम से शुरू मुझ पर सिमटता था दायरा अपना

आखिर ज़माने की रीत ने दिया हमको मिला
पन्ने पलटती रही,हर्फ़ बढते,चाहते घटती रही
दुनिया,रुतबा,शौहरत,पैसे से पीछे रह गयी मै
साथ साथ थे पर फ़ासले बढ गये थे दरमिया’

पुरानी आदत है मुड के कल देखती नही कभी
फ़ुर्सत को माज़ी के हवाले कर आज को कहा
कह दो,सोना ने कहा है मन्नू घर जल्दी आये
आज रविवार हैHate Story दिखाने ले जायें ।

एक गुलाबी चश्मा

अपने अन्तहीन सवालो के जन्गल से
जब कभी बाहर निकलोगी तुम सोना

देखोगी खयालो के दलदल मे फ़न्सी
कितनी पीछे छोड आयी हो खुशी को

इतनी बेरन्गी नही है दुनिया तुम्हारी
जितनी तुम समझती आयी हो सोना

वक़्ती तूफ़ान से उडे गम के दो छीन्टे
तुम्हारे चश्मे के फ़्रैम पर आ बस गये थे

कम्बख्त जम गये है घर जवाई बन कर
विदा करके उन्हे एक गुलाबी चश्मा ले लो

हसीन दुनिया को रन्गीन आन्खो से देखो
ज़िन्दगी जी लो ,गम को मुड के ना देखो ।