दो दशक

हम मिले ज़िन्दगी के उस मोड़ पर फिर से,
जहाँ तुम उतने ही साधारण थे जितनी की मैं ,
एक मार्गदर्शक, एक हमसफ़र के चेहरों से छुपे,
अपने आगे अपनो के सुख दुःख को जीते हुए।

ये अच्छा हुआ कि हम मिले फिर से ,
सदियों बाद ही सही पर मिले तो सही ।
वक़्त की धूल से परे था जो रिश्ता ,
वक़्त देकर उसे नया रंग दिया तो सही।

हाँ , वैसे नहीं जैसे मिला करते थे पहले,
दो दोस्तो की तरह ,बस- मैं और तुम,
अपने दायरों में ज़िन्दगी के मायने तलाशते ,
जिनका कोई माझी न था, न मानी था कोई.

हम मिले ज़िन्दगी के उस मोड़ पर फिर से,
जहाँ तुम उतने ही साधारण थे जितनी की मैं ,
एक मार्गदर्शक, एक हमसफ़र के चेहरों से छुपे,
अपने आगे अपनो के सुख दुःख को जीते हुए।

तुम्हारी खामोश बेचैनी आज भी बोलती है,
मेरे सतही शब्दों में सागर खोज लेते हो तुम ।
तुम्हारे साथ मैं फिर सत्रह की बन जाती हूँ,
वक़्त की शाख गिरने से रोक लेते हो तुम.

वो तूफ़ान तुम्हारे चेहरे के पीछे देखा था पहले,
धीमे धीमे आज भी वो दरिया बन के बहता है.
जो मेरे अनगिनत सवालों से गुज़रा था कभी.
वो उफान सोयी ज्वालामुखी बन धधक रहा है।