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गुज़रा साल और तुम

तेरे आज और कल के दरमियान/
एक सदी गुज़र गयी एक साल मे//

खोल कर मुट्ठी झान्क कर देख/
पिघला दिल सोया है किस हाल मे//

जिसकी याद मे ठोकरे खायी है/
खुद से खुद का हाल छुपाते//

रुक कर मुडके एक बार न देखा/
कर जो बेहाल गया,उस ख्याल ने।

कटी पतन्ग है तू

तेरे वादे तुझसे झूठे निकले
आस्मा क्यू तुझसे प्यार करे

कटी पतन्ग है तू लापरवाह
हवा का रुख क्या इन्तज़ार करे

बादल की हो पवन बसन्ती
इठलाए,गगन भी आह भरे

बरस गया गर आस्मा रो कर
तेरी हस्ती को मिटा जायेगा

आह भर के तुझे छू जाऊन्गी
सीने मे जब धरा के समायेगा

फ़ुर्सत – रविवार

फ़ुर्सत ने दस्तक दी आज रविवार के दिन
पुरानी यादो का बस्ता बोझे मे था लाया
बुझे लम्हो की धूल हटा के अन्दर झान्का
हमारे रिश्ते का बहिखाता पहले हाथ आया

पुरानी आदत है हिसाब शुरु से बान्चती हू मै
पीले पडे पहले पन्ने पे जा हाथ थम सा गया
सिरहन हुई, छू के जगा गया सोये दिल को
लम्स उस पहली मुलाक़ात का दर्ज था वहाँ

कितना मासूम था तेरा मेरा रिश्ता तब, मन्नू
गुलाब की अनछुई अधखिली कली की तरह
न रिश्ते थे न नाते थे और न कोई गुस्ताख पल
तुम से शुरू मुझ पर सिमटता था दायरा अपना

आखिर ज़माने की रीत ने दिया हमको मिला
पन्ने पलटती रही,हर्फ़ बढते,चाहते घटती रही
दुनिया,रुतबा,शौहरत,पैसे से पीछे रह गयी मै
साथ साथ थे पर फ़ासले बढ गये थे दरमिया’

पुरानी आदत है मुड के कल देखती नही कभी
फ़ुर्सत को माज़ी के हवाले कर आज को कहा
कह दो,सोना ने कहा है मन्नू घर जल्दी आये
आज रविवार हैHate Story दिखाने ले जायें ।

फ़टी पहरन

दिखाई न दू ज़माने भर को कभी भी सोना
कोई जादुई तरक़ीब तुम मुझे सिखा दो ना

दिन भर ज़माने मे जहा से भी गुज़रती हू
भूखी नज़रे मेरे तन से लिपट साथ आती है

रोज़ दागदार कर देती है मेरा कोरा दामन
रोज़ रगड वहशियत तन को छील जाती है

छाले पड गये है मेरे अस्तित्व के दामन पर
बेबस असमत त्राह त्राह कर ज़ार ज़ार रोती है

हया के नक़ाब के पीछे छुप कभी जाऊ अगर
वहशी नज़रे आन्खो से मन्न को कुतर जाएगी

कुछ तो करना होगा कुछ कर गुज़रना होगा
ज़ुल्म और बेबसी कुचल खुद आगे बडना होगा

जीना होगा साथ इनके,साथ जी के मरना होगा
डर से निडर हो कर, सबल बनके चलना होगा

सर ऊठा कर अपने स्वाभिमान का मान रक्ख
तार तार हुई फ़टी पहरन को रोज़ बदलना होगा

एक गुलाबी चश्मा

अपने अन्तहीन सवालो के जन्गल से
जब कभी बाहर निकलोगी तुम सोना

देखोगी खयालो के दलदल मे फ़न्सी
कितनी पीछे छोड आयी हो खुशी को

इतनी बेरन्गी नही है दुनिया तुम्हारी
जितनी तुम समझती आयी हो सोना

वक़्ती तूफ़ान से उडे गम के दो छीन्टे
तुम्हारे चश्मे के फ़्रैम पर आ बस गये थे

कम्बख्त जम गये है घर जवाई बन कर
विदा करके उन्हे एक गुलाबी चश्मा ले लो

हसीन दुनिया को रन्गीन आन्खो से देखो
ज़िन्दगी जी लो ,गम को मुड के ना देखो ।

अन्दाज़ ए हुनर

ज़ो राते कटती थी लिख कर,अब सो कर गुज़रती है
निगल गया सुकून ए समन्दर मेरा अन्दाज़ ए हुनर

ज़ो आन्खे ख्वाब बुनती थी सजाने सपनो का शहर
रहनुमा बन सुला गया सुकून रात के तीसरे पहर

अब न मै पिया की रही न साहिर की न सौदायी की
खुली पलको पे नीन्द सजाती हू हर रात तन्हाई की

मेरे बिना चान्द की चान्दनी भी कितनी उदास होगी
जागती रातो के इन्तज़ार मे राह मेरी तकती होगी

सुबह लाती है हर रोज़ साथ सूरज के तेज को घर
पर मेरा आशिया बसता है आज भी चान्द के सहर

हरसिन्गार के फ़ूल

ज़िन्दगी रेत के टीलो की गुलाम है अब
जो महकती थी फ़िज़ा मे कभी दुआ बन
कभी हरसिन्गार के फ़ूल सजा तन मन
धूल मे सनी है वादिया ख्वाबो की अब

आन्धिया चलती है बैरागी बन आजकल
तुम नज़र आ कर भी दिखाई नही देते
कानो तक आ रुक जाती है कुछ सदाए
लफ़्ज़ हो जैसे तुम्हारे पर सुनाई नही देते

रेगिस्तान सा बन्जर उदास दिल हो गया है
केक्टस उग आये है सूखे मन की सतह पर
एक रुकी चीख बन के अटक पडे है मिसरे
मन्न को झिन्झोड कहानी बनके नही बहते

तुम ग्यान की एक बून्द बन बरस जाओ न
भूल गयी लिखना आओ फिर सिखलाओ न
अलफ़ बे पे के कसीदे चलो फिर से पड ले
तख्ती साफ़ है ,मिल कर एक कहानी रच ले

सुकून मिले मुझे थोडा,पलको पे नीन्द सजाऊ
मन्न मे उछलते खयालो को कोई लोरी सुनाऊ
वक़्त की आन्धी शायद नाराज़ हो लौट जाये
धूलित अल्फ़ाज़ सावन के पपीहे से चहक जाये

और महक जाये अल्फ़ाज़ से फिर ज़िन्दगी ये मेरी
जी जाऊ और मै एक सदी ओस की बून्द बन कर

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