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एक अजनबी की तरह

अपने ही शहर मे आये है
एक अजनबी की तरह
दबे कदमो का बोझा लिये
तेरी आहट ने भी पराया
कर दिया था यहा हमको

तू वो रहनुमा नही जिसे
मेरी निगाह तलाशे सदा
फिर क्यू दोबारा तेरी ही
चौखट पे ला खडा कर
रुसवा कर दिया हमको

सान्से चलती है अबतक
राते देर तक सुलगती है
ये ज़िन्दगी शौक नही है
बुझता जुनून है अबतक
पर सर्द आहे बुझी नही है

सिर्फ़ यादो की राख है
नासूर बन के ज़िन्दा है ।

तुम्हारे दिल तक जाता हर रस्ता
तन्ग दरीचो से गुज़र निकलता है
कुछ बन्द दरवाज़े दरमिया आते है
खयालो पे हर वक़्त पहरा रह्ता है

उम्मीद की नन्ही किरन का टीका
सहेज सर माथे पे क्या लगा पाओगे
मै उफ़नता ,उमडता प्रेम दरिया हू
तन्ग गलियो मे क्या बसा पाओगे

सब से छुप के गमो की चादर ओडे
बयाबान मे अकेले थे तुम अब तक
डर है तेरे दिल के डूबने उबरने तक
भूलभुलैया मे न खो जाये उदास मन

हज़ार कोने है तेरे दिल की गहराई मे
और तुम सूखी बाओली,अन्धेरी गहरी

यू टर्न

Reposting An Old Poem

यू टर्न

हर क़दम संभल के रखो
हर हरफ़ वज़न कर कहो
कल् क्या पता हो न हो
लाइफ में यू- टर्न नही है …..

हर रिश्ता खुल के जियो
शक को जगह कोई न दो
जो कहना है आज कहो
कल की कोई शाख नही है ……..

नाराज़ हो कर तुम
दायरे समेट तो लो
पर दिल में दरिया रखो
हमदम खुदा तो नही है ……

तोड़ने से पहले कोई दिल
आयने में झाँक तो लो
जो रहता है उस पार वो
इतना भी पाक नही है …

चटक जाए रिश्ता कोई
फिर से जुड़ सकता है
झिर्रिया फिर भी दिखती है
गांठो में साख नही है ……

हर कदम संभल के रखो
हर हरफ वजन कर कहो
हर नाता प्रेम से बाँचो
की रिश्तो में आंच नही है ….

पल भर में बुझते है
सदियों में फ़ना होते है
नाज़ुक होते है बड़े रिश्ते
रिश्तो की शुरुवात यही है …..

तेरी जीवनसंगिनी

क्या करू कि कैसे तेरा दर्द बाँट लू मैं
दूर रह कर भी तुझे खुद से ढांप लू मैं
ग़र न उबार पाओ इस आह-ऐ-दिल को
कुछ लफ्ज़ भेज देना जिन्हें बांच लू मैं

लफ्जों में दुआओं का असर फूंक देंगे
गम जहन की परतो में दफ्न कर लेंगे
कायनात को सूखे अश्को का सबब दे
थोड़ी ख़ुशी- मुस्कराहट मोल ले लेंगे

एक बार देख लू जो तुझे जी भर हँसते
परवाह नहीं फिर तू मुझे मिले न मिले
दिल को इतनी तस्सली तो हो जायेगी
ख़ुशी तेरी जीवनसंगिनी बन जायेगी ……

मैं जितना भी ऊंचा कूदूं
हाथ मेरे नहीं आते हो
तुम चाँद की छाती पर चढ़
आसमा में खो जाते हो

नभ के तारे दोस्त है मेरे
सब राज़ बतलाते है
जब चाँद खर्राटे लेता है
वों धरती पर आ जाते है

और मेरे घर की तख्ती पर
नाम अपना दर्ज करवाते है
जानती हूँ तुम ये छुपाते हो
तारो संग तुम भी आते हो

जैसे ही मैं हाथ बढाती हूँ
तुम नभ में उड़ जाते हो
तारो संग आँखमिचोली खेल
मेरे दिल को तडपाते हो

आसमा में उड़ते जाते हो
गुरुत्वाकर्षण रूल भुलाते हो

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