नया साल

दिन फिर वही होंगे और वही होगी रात,
कुछ कच्चे बे-लम्स, कुछ गहरे जज़्बात।

हैरान कर जाएगा ज़माना किसी रोज़,
चैन ले जाएगा करके किसदिन मधहोश।

फिर दिल टूटेंगे ,फिर होगा बेहद मलाल,
पर फिर भी मुबारक हो तुमको नया साल.

एक हर्फ़ एक सिफर से एक ऊपर बुना,
एक पुराना तन पहने नया उजला लिबास.

वक्त किसका हुआ बोलो ...

 

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नेता जी कहैं

प्रेस  के कैमरों की चुंधियाती रौशनी में,
बंद आँखें एडजस्ट करते नेताजी बोले –

“कम सवाल करना इंसानियत के नाते ,
मन व्यथित है आज, शब्द मौन है सारे। ”

दुखद खबर है फिर सूखा पडा देहात में,
पीने को पानी नहीं, चूल्हे पडे हैं राख में.

अजब हाल है मेरे आंसू फिसल रहे हैं ,
और सीने में धधकते कोयले जल रहे हैं।

दिल करता है कि मैं फांसी चढ़ जाऊं ,
किसानो के दुःख में मरके सोग मनाऊँ । ”

झुकी गर्दन ने ऐसा ज़ोर का बल खाया,
सेक्रेटरी ने लपक झपक के हाथ बढ़ाया।

गिरती टोपी सर्र से सर पे वापिस आई ,
फिर नेताजी ने धीमे से आवाज़ लगायी।

“अरे भाई, ज़रा ये ऐ. सी. यहाँ घुमाना।
पांच सितारा होटल है या गुसलखाना।

पसीने से तर बतर हमारा गहरा बदन है ,
सफ़ेद कुर्ते पर काले पसीने की पहरन है।

कैसे दें सांत्वना लोगों को ऐसे हालात में ,
न आवाज़ में दम है , न चर्बी है आंत में ।

सफ़ेद मांस पर सील लगा दी माई बाप ने,
पर काले भैंसे तो बहुत फिरा करें हैं देहात में.

भारत में भूख सिर्फ इंसान को नहीं डसती,
मुर्दों की बस्ती में जनावर की भी है हस्ती ।

जाइए, नफरत की चिंगारी एक जलाइए,
फिर मिल कर हमरे साथ दावत खाइये।

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वक़्त 

दाँत काटी रोटी बाँटते थे जो कल तक मिल कर,

आँख भर के अब एक दूसरे को देख नहीं सकते.

कौन कहता है वक़्त के साथ नज़रिये नहीं बदलते.

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रेशम की रस्सी

रेशम की रस्सी सी हाथों से फ़िसलती है,
अधपकी धूप बनके आंखों में मचलती है।

लुक्का छुप्पी ,ऊन्च नींच,पक्की सहेली हैं,
कभी कभी,सुख दुख के संग संग खेली हैं।

अजब है गजब है,इसे तमाशों की तलब है,
दूर जा हंसती है,पास आ करे अठ्खेली है।

ग़ैर है कि अपनी है,किस्सा है या पहेली है,
उलझन नही ये ज़िन्दगी सांसो की ढेरी है।

सजा लो संवार लो,इसे शीशे में उतार लो,
अक्स आईने में न डूबे,थाम के उबार लो।

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क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
मै बेवजह गर रूठ जाऊ तुमसे
जान बेवजह फ़िर भी मना लो तुम
बेबात बेकरारी चुभती है दिल मे

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
मै गर बेबात जो सताऊ कभी
तुम हाथ पकड आन्खो से छेडो
और मै सिमट खो जाऊ खुद मे

तेरा हो कर भी न होना है जैसे
बारिश की सूखी बून्द हो कोई
बेवजह रिश्ता तय जो किया था
जीने की वजह ढून्ढती हू तुम मे

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
बातो की गन्गा मे दोनो बह जाये
खामोशी के दायरे न निगल पाये
और ये रिश्ता डुबा के उबारे हमे

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गुज़रा साल और तुम

तेरे आज और कल के दरमियान,
एक सदी गुज़र गयी एक साल मे.

खोल कर मुट्ठी झान्क कर देख,
पिघला दिल सोया है किस हाल मे.

जिसकी याद मे ठोकरे खायी है,
खुद से खुद का हाल छुपाते.

रुक कर मुडके एक बार न देखा,
कर जो बेहाल गया,उस ख्याल ने।

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कटी पतन्ग है तू

तेरे वादे तुझसे झूठे निकले
आस्मा क्यू तुझसे प्यार करे

कटी पतन्ग है तू लापरवाह
हवा का रुख क्या इन्तज़ार करे

बादल की हो पवन बसन्ती
इठलाए,गगन भी आह भरे

बरस गया गर आस्मा रो कर
तेरी हस्ती को मिटा जायेगा

आह भर के तुझे छू जाऊन्गी
सीने मे जब धरा के समायेगा

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