वक़्त 

दाँत काटी रोटी बाँटते थे जो कल तक मिल कर,

आँख भर के अब एक दूसरे को देख नहीं सकते.

कौन कहता है वक़्त के साथ नज़रिये नहीं बदलते.

रेशम की रस्सी

रेशम की रस्सी सी हाथों से फ़िसलती है,
अधपकी धूप बनके आंखों में मचलती है।

लुक्का छुप्पी ,ऊन्च नींच,पक्की सहेली हैं,
कभी कभी,सुख दुख के संग संग खेली हैं।

अजब है गजब है,इसे तमाशों की तलब है,
दूर जा हंसती है,पास आ करे अठ्खेली है।

ग़ैर है कि अपनी है,किस्सा है या पहेली है,
उलझन नही ये ज़िन्दगी सांसो की ढेरी है।

सजा लो संवार लो,इसे शीशे में उतार लो,
अक्स आईने में न डूबे,थाम के उबार लो।

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
मै बेवजह गर रूठ जाऊ तुमसे
जान बेवजह फ़िर भी मना लो तुम
बेबात बेकरारी चुभती है दिल मे

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
मै गर बेबात जो सताऊ कभी
तुम हाथ पकड आन्खो से छेडो
और मै सिमट खो जाऊ खुद मे

तेरा हो कर भी न होना है जैसे
बारिश की सूखी बून्द हो कोई
बेवजह रिश्ता तय जो किया था
जीने की वजह ढून्ढती हू तुम मे

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
बातो की गन्गा मे दोनो बह जाये
खामोशी के दायरे न निगल पाये
और ये रिश्ता डुबा के उबारे हमे

गुज़रा साल और तुम

तेरे आज और कल के दरमियान,
एक सदी गुज़र गयी एक साल मे.

खोल कर मुट्ठी झान्क कर देख,
पिघला दिल सोया है किस हाल मे.

जिसकी याद मे ठोकरे खायी है,
खुद से खुद का हाल छुपाते.

रुक कर मुडके एक बार न देखा,
कर जो बेहाल गया,उस ख्याल ने।

कटी पतन्ग है तू

तेरे वादे तुझसे झूठे निकले
आस्मा क्यू तुझसे प्यार करे

कटी पतन्ग है तू लापरवाह
हवा का रुख क्या इन्तज़ार करे

बादल की हो पवन बसन्ती
इठलाए,गगन भी आह भरे

बरस गया गर आस्मा रो कर
तेरी हस्ती को मिटा जायेगा

आह भर के तुझे छू जाऊन्गी
सीने मे जब धरा के समायेगा

फ़ुर्सत – रविवार

फ़ुर्सत ने दस्तक दी आज रविवार के दिन
पुरानी यादो का बस्ता बोझे मे था लाया
बुझे लम्हो की धूल हटा के अन्दर झान्का
हमारे रिश्ते का बहिखाता पहले हाथ आया

पुरानी आदत है हिसाब शुरु से बान्चती हू मै
पीले पडे पहले पन्ने पे जा हाथ थम सा गया
सिरहन हुई, छू के जगा गया सोये दिल को
लम्स उस पहली मुलाक़ात का दर्ज था वहाँ

कितना मासूम था तेरा मेरा रिश्ता तब, मन्नू
गुलाब की अनछुई अधखिली कली की तरह
न रिश्ते थे न नाते थे और न कोई गुस्ताख पल
तुम से शुरू मुझ पर सिमटता था दायरा अपना

आखिर ज़माने की रीत ने दिया हमको मिला
पन्ने पलटती रही,हर्फ़ बढते,चाहते घटती रही
दुनिया,रुतबा,शौहरत,पैसे से पीछे रह गयी मै
साथ साथ थे पर फ़ासले बढ गये थे दरमिया’

पुरानी आदत है मुड के कल देखती नही कभी
फ़ुर्सत को माज़ी के हवाले कर आज को कहा
कह दो,सोना ने कहा है मन्नू घर जल्दी आये
आज रविवार हैHate Story दिखाने ले जायें ।

फ़टी पहरन

दिखाई न दू ज़माने भर को कभी भी सोना
कोई जादुई तरक़ीब तुम मुझे सिखा दो ना

दिन भर ज़माने मे जहा से भी गुज़रती हू
भूखी नज़रे मेरे तन से लिपट साथ आती है

रोज़ दागदार कर देती है मेरा कोरा दामन
रोज़ रगड वहशियत तन को छील जाती है

छाले पड गये है मेरे अस्तित्व के दामन पर
बेबस असमत त्राह त्राह कर ज़ार ज़ार रोती है

हया के नक़ाब के पीछे छुप कभी जाऊ अगर
वहशी नज़रे आन्खो से मन्न को कुतर जाएगी

कुछ तो करना होगा कुछ कर गुज़रना होगा
ज़ुल्म और बेबसी कुचल खुद आगे बडना होगा

जीना होगा साथ इनके,साथ जी के मरना होगा
डर से निडर हो कर, सबल बनके चलना होगा

सर ऊठा कर अपने स्वाभिमान का मान रक्ख
तार तार हुई फ़टी पहरन को रोज़ बदलना होगा