सलवटे…..

उठी सुबाह तो खुद को मुस्कुराते पाया
लगा कल रात सपने में था तू आया
तेरी उँगलियों की थर्कन बदन पर मिली
पलट के देखा तो बिस्तर पर
सलवटे थी पडी ……

लगा कल रात तू यही था यही
मेरी सान्सो में तेरी खुश्बू थी बसी
ख्वाब था शायद या था हक़ीक़त
तू यही था मेरे करीब …
बहुत ही करीब…..

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कविता में प्रकाशित किया गया | 9 टिप्पणियाँ

निर्वान मार्ग

सड़क पर इन्सानो कि भीड़
आस्मान मे सितारो कि भीड़
राशन के लिये कतारे और भीड
कहा है शान्ति का मार्ग…

बाज़ारो मे सामानो कि भीड
कब्रीस्तान में मज़ारो कि भीड
हस्पताल मे बीमारो कि भीड
कहां है निर्वान का द्वार …

मन्दिर मे भक्तो कि भीड़
सीणेमा मे आसक्तो कि भीड़
पहाडों पर सैलानियो की भीड
कहां है मुक्ति का मार्ग्……

घर पर मेहमानो कि भीड़
मन मे सवालो कि भीड
समाज मे रुडिवादियो कि भीड
कहा है ग्यान का मार्ग्…॥

इस भीड़भाड़ से निकल के
एक कोने मे छुपे बेअदब
बेलगाम बचपन को
अमर करने का
मार्ग दिखा दे
ए मौला……

इसके पाक मन के सहारे
मैंऔर करु मोक्श कि प्रप्ति
तब जीवन से तर जाऊं …..

कविता में प्रकाशित किया गया | 5 टिप्पणियाँ

कशमकश …..

एक कशमकश है , है नाम – ज़िंदगी
कभी ख्वाब दिखती , कभी रवानगी

दौड़ता रहा पीछे जिसके तू दिन भर
तेरी परछाई थी , साथ चली तेरे दिलबर
अब हुई शाम और तू मुड़ा है अब
कहाँ है वो…….
वो घुल गयी साँझ की किरणो के साथ
शाम ढले आने वाली शब बन कर

‘शेष कल’ ….

कविता में प्रकाशित किया गया | 6 टिप्पणियाँ

चौबे जी के खर्राटे…..

बंद कमरे के सन्नाटे में
चार दीवारी से झन्नाटे,
बज जाते फिर
धीरे से रुक रुक जाते
बरसो बीत गये है फिर भी
जब-तब आ कानो से है टकराते
चौबेजी के ख़रखराते… ख़र्राटे

बात है उन दीनो की हुई
जब गर्मियों की छुट्टी
बुआ मामी संग आ पहुँची
ले छुनु मुन्नू बन्नू की टोली

जून में थी बनी दीवाली
चँदाल चौकड़ी जमी थी भाई
खुराफ़ति दिमIगो ने मिल के
एक तरकीब बनाई ….

पहुँचे बाग़ में मिल सारे
अब वन माली की शामत आई….
दरख़्त लदे थे आमो से
तोड़े आम दे पत्थर दे
चँदाल चौकड़ी ने जो तबाही मचाई
लो भैया, अब टोली की ही शामत आई….

नाक में दम जब भर गया
सभी बदो ने ये तेह किया
नही सोयेंगे सब बच्चे संग
यहाँ वहाँ की जगह तेह हो ली …..
छन्नु मुन्नू का बिस्तर था
चौबेजी से सटा हुआ
रात आते आते ही
दोनो की शामत आई…

चौबेजी की उम्र थी सत्तर
घर के बड़े थे ,रौब था सब पर
सोते थे चादर तान कर
लेकर ख़र्रटे मन भर, गज भर….

जैसे जैसे रात बड़ी
ख़र्राटे की रफ़्तार बड़ी
कानो में ठूँसी थी रुई पर
उससे भी ना बात बनी
कभी इधर पलट, कभी उधर
नींद नही आने को थी

चुननु ने मुन्नू से सलाह कर
धीरे से पास में जा कर
चौबेजी की नाक में दी तीली…..

घबरा के उठे चौबेजी
देख शैतानो को थ्योरियाँ छड़ी
लो जी वो तूफ़ान उठा घर में
अब तक याद है वो रात बड़ी

मुर्गा बनके दिन भर
कैसे निकाली थी तौबा -तौबा
चुननु मुन्नू ने छुट्टी गर्मियों की ….

चौबेजी चले गये स्वर्ग को
बच्चे भी हो गये है बड़े
पर गूजते है उस कमरे में अब भी
चौबेजी के ख़र्राटे…….

कविता में प्रकाशित किया गया | 1 टिप्पणी

शाही जनाब…

सड़क पर,बसो में,बाजारो में, कूचो में, गलियारों में, दफ़्तरों में मिलने वाले आम शहरी नागरिक का वर्णन हे ये :
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क्या करिए अजी हम तो ऐसे हैं

मन चाहे वहाँ पीक फेंके हैं
सड़क को कूड़े -दान समझे हैं

क्या करिये अजी हम ऐसे हैं…

नही कतारें लिए हमारी
धक्का दे के सफ़र करते हें

क्या करिये अजी हम तो ऐसे हें…

देख बुजर्गो ,नारियों को
आंखें हम बंद करते हेँ
सुख चेन हमारा पहले आये
यारो हम तो सफ़र करते हें,

क्या करिये अजी हम तो ऐसे हें …

दरिया दिल फैला कर हम रखते हें
गलत पता का भी पता देते हें

क्या करिये अजी हम ऐसे हें…

हलके कागज़ के उपर से
भारी फ़ाइल चला देते हें
चाय पानी बिना कभी भी
कलम उठाकर नही रखते हें

क्या करिये अजी हम ऐसे हें…

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किसी के हृदय और सम्मान को ठेस पहुचने का इरादा नही हे …
ग़र बुरा लगे तो क्षमा करिएँ,
ऐसे ही हे हम …
जो देखते हैं ……सच लिखते हैं…
क्या करिये अजी हम……ऐसे हैं…..

कविता में प्रकाशित किया गया | 6 टिप्पणियाँ

जेओमेट्री

दुनिया गोल है ….

धुरी पर गूमती धरती
आ जाती है वापिस धुरी पर …….

सूरज गोल है ,चन्दा भी गोल है
फिर आ जाते है वहीं पर ही
सफ़र शुरू किया था जहाँ पर
दिन रात का मिल कर कभी…..
समय
का चक्र चलता रहता हे
गोल हैं शायद इसलिए ये
सब ही …..

गर…
धरती गोल है तो मकान चौकौर क्यूं
ग़र….
दुनिया गोल है क़ब्र चौकौर क्यूं

इसलिए शायद ……

आदमी दुनिया में कहीं भी जाए आख़िर
वापिस आता है घर ही अपनी चार दीवारी में,
अपने दायरे के भीतर…..

छुप के जग से कहीं भी
चला जाए
आखिर आदमी जाता तो वही ही
छे ग़ज़ ज़मीन के नीचे
कब्रीस्तान की चार दीवारी में
क़ब्र के चार कोनुओ में सिमटकर
रहने को सदा वहीं ……

कविता में प्रकाशित किया गया | 3 टिप्पणियाँ

यादें तेरी…

बहुत याद आता तेरा मुस्कुराना,
वो दबे पाँव आकर पास बैठ जाना
वो हौले से कानो में मेरे गुनगुनाना
“कोई दूर से आवाज़ दे तो चले आना”….

मैं शायर , अल्हड नादाँ
समझा नही दिल की जुबां
तेरी चुप्पी में एक बात छुपी थी
रहा मैं उस से कैसे अनजान ….

आंखों से जों बात कहीँ थी

पलकें खुली , कभी झुकी सी
सोचा आज तो लगा यही
क्यों में नैनो की मौन व्यथा
समझा नही…..
यादें तेरी…

दिल में हल्की सी आज

कसक दे गयी

जब एक पुरानी किताब से अचानक ,

तेरी शादी की तस्वीर गिर पड़ी…

तभी कानों में एक आवाज़ पड़ी

“कोई दूर से आवाज़ दे चले आना………”

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