सर्वशेषठ लघु कथा श्रेणी प्रतियोगिता

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कांच

कांच है ….चटक गया तो क्या
देखो तो जुड़ कर अब भी खड़ा है…….

वो “पैटर्न ” जो दीखता है उस पर
तितली है या जैसे जुगनू हो फैले
चटक की “लाईनों ” से गुज़र कर
रोशन हो जाए “पैटर्न “जैसे …….

जैसे …… मर्यादा औरत की
ठोकर लगने पर भी हर दिन
जिंदगी को नए मायने देती है
चटक की “लाइन ” से गुज़र के
जिंदगी को रौशनी से भर देती है ….
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बहुत जल्दी में हूँ ……..

ग्यांन स्त्रौत कहीं सूख ना जाए
लिख लूं बहुत जल्दी में हूँ
मॉरपंखी कलाम की स्याही
कहीं सूख ना जाए
लिख लूं बहुत जल्दी में हूँ

व्यापक विचार समेटे खड़ा मन
साँझ के अंतिम छ्होर पर
लेख तार कोई टूट ना जाए
लिख लूं बहुत जल्दी में हूँ

विचार विमर्श उत्पीड़न उलांगना
द्वंध प्रतिद्वंध आँचल में समेटे
ह्रदय गति कहीं रुक ना जाए
लिख लूं बहुत जल्दी में हूँ ……..