वक़्त 

दाँत काटी रोटी बाँटते थे जो कल तक मिल कर,

आँख भर के अब एक दूसरे को देख नहीं सकते.

कौन कहता है वक़्त के साथ नज़रिये नहीं बदलते.

त्रिवेणी

शीरा जुबान पे खंजर कमान में
मुखौटे हसीं पर चेहरे बईमान से

केकड़े है रेत के चलना संभाल के

कुछ त्रिवेनियाँ …….

धीमी सी हैं साँसें मेरी
बहुत तेज़ पर रफ़्तार तेरी

ए मौत तू जीतेगी जंग आज……
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ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त का बाज़ार है गरम साहिब
हुस्न,इश्क़ और जज़्बात बहुत बिकते हैं यहाँ

वफ़ा और क़ुर्बानी की क़ीमत पर है बहुत कम….
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जोड़ के रक्खा था जिसने सबको
तागा वो आज पर चटक हीगया

टूटे टुकड़े ज़ख़्म छोड़ गये गहरे……
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जादूगर ज़ो छू मंतर बोलेगा
दिखते को ग़ायब कर देगा

नफ़रत करे फ़ना तो शफा मानू ……..
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मा के पल्लू में छुपा करती थी जो कल् तक
आज शर्मा के अपने आँचल में सिमटी बैठी है

पराया धन है ज़ो ले जाएँगे डोली में कहार…….
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