Category Archives: कविता

पलाश के फूल

पतझड़ बसंत के मौसम में, आसाँ नहीं पलाश फूल होना. पल में आस्मां का सितारा, पल में ज़मीं में धूल होना. पत्तों को अलविदा कहते शाखों का ठूँठ का होना ! बरस हर बरस बहार बन, पाइयों तले मसल मरना। … पढना जारी रखे

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अहम् 

मर गया तो मै नहीं, फ़िर मै का अस्तित्व क्या, तस्वीरों की गुफ़्तगू से बस दीवारें ही सजती हैं!

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नया साल?

  बरसों से साल की शुरुवात एक कविता लिख कर करती हूँ. पिछले नए साल पर ये लिखा था, पर जवाब मिले नहीं अभी तक. सवाल बन कुछ इस तरह ज़हन में अटके पड़े हैं : क्या फिर वही होंगे … पढना जारी रखे

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माँ

  कभी सोचा है माँ के काँधे कितने दुखते होंगे, नित नयी जिम्मेदारियों के तले और थोड़ा झुकते होंगे। कितनी उम्मीदें, आशाएं, उपेक्षाएं बाजुओं को खोंचती होंगी, वो दिन में मुसकुराती माँ, रात भर नींद में सिसकती होगी। छू के … पढना जारी रखे

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गुज़रा साल और तुम

तेरे आज और कल के दरमियान,
एक सदी गुज़र गयी एक साल मे. पढना जारी रखे

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नीम

थोड़ी कड़वा हो रही हूँ। शायद नीम हो गयी हूँ ! पढना जारी रखे

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जन्माष्टमी के दिन

जन्माष्टमी के दिन नवशिशु कान्हा को दूध से नहलाते हैं, नये वस्त्र पहनाकर सोलह श्रंृगार किये नयी राधा रानी के संग झूले पर सजाते हैं । झांकियाँ निकलती हैं, ढोल मंजीरों के बीच कान्हा कान्हा की हूंकार से गुज़र हर … पढना जारी रखे

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