क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
मै बेवजह गर रूठ जाऊ तुमसे
जान बेवजह फ़िर भी मना लो तुम
बेबात बेकरारी चुभती है दिल मे

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
मै गर बेबात जो सताऊ कभी
तुम हाथ पकड आन्खो से छेडो
और मै सिमट खो जाऊ खुद मे

तेरा हो कर भी न होना है जैसे
बारिश की सूखी बून्द हो कोई
बेवजह रिश्ता तय जो किया था
जीने की वजह ढून्ढती हू तुम मे

क्यू न कभी ऐसा हो,बोलो मन्नू
बातो की गन्गा मे दोनो बह जाये
खामोशी के दायरे न निगल पाये
और ये रिश्ता डुबा के उबारे हमे

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लेखक: Gayatri

A dreamer, a wanderer, traveller & explorer, a nomad at heart. Found refuge in poetry and storytelling. Writing the bestseller called Life.Sometimes shares travel tales. I travel thus I write. I write therefore I am.

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