आधे ….अधूरे …

टुकडो में छुआ है तुमको
कभी सुबह की ओस बन कर
कभी लबो पे शोख बन कर …

बन के मदमाती हवा
गुज़रा हूँ गेसुओं से तेरी
और बन के परवाना कभी,
मिला हूँ शमाओं सें कई….

टुकडो में जिया है अब तक
आधे अधूरे ख्वाब बुन कर…..
ले के दिल में आस तेरी
अब से तब तलक ठन कर

जो पा सकू तुझे कभी
तो गुज़र जायेगी इक सदी
कभी ग़मों का शाख बन कर
कभी खुशी का साथ बन कर

न मिल सको गर तुम ..
तो कट जायेगी ज़िन्दगी
कभी फलक की राख बन कर
कभी सेहर की ख़ाक बन कर …..

…..और में हवाओं में घुल कर
लिपट जाऊँगा गेसुओं से तेरी ……

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लेखक: Gayatri

A dreamer, a wanderer, traveller & explorer, a nomad at heart. Found refuge in poetry and storytelling. Writing the bestseller called Life.Sometimes shares travel tales. I travel thus I write. I write therefore I am.

17 विचार “आधे ….अधूरे …” पर

  1. टुकडो में जिया है अब तक
    आधे अधूरे ख्वाब बुन कर…..
    ले के दिल में आस तेरी
    अब से तब तलक ठन कर

    बेहतरीन लगी यह पंक्तियाँ सुन्दर अच्छा लिखा है आपने

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