कांच

कांच है ….चटक गया तो क्या
देखो तो जुड़ कर अब भी खड़ा है…….

वो “पैटर्न ” जो दीखता है उस पर
तितली है या जैसे जुगनू हो फैले
चटक की “लाईनों ” से गुज़र कर
रोशन हो जाए “पैटर्न “जैसे …….

जैसे …… मर्यादा औरत की
ठोकर लगने पर भी हर दिन
जिंदगी को नए मायने देती है
चटक की “लाइन ” से गुज़र के
जिंदगी को रौशनी से भर देती है ….
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About Gayatri

A storyteller. Poetry, fiction, Travel tales, CSR, Parenting, Images. Writing the bestseller called Life. Communication strategist. Freelance writer. Candid photographer @ImaGeees. I travel, thus I write. I write, therefore I am. Please mail at imageees@gmail.com for writing/photography assignments.
यह प्रविष्टि कहानी में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

7 Responses to कांच

  1. गायत्री कहते हैं:

    bahut shukriya aap sabka.

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  2. Vinay Prajapati NAZAR कहते हैं:

    behad sundar bhav pradrashan!

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  3. राजीव रंजन प्रसाद कहते हैं:

    प्रयोग की दृश्टि से रचना अनूठी और बेहतरीन है..

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  4. DR.ANURAG कहते हैं:

    चटक की “लाइन ” से गुज़र के
    जिंदगी को रौशनी से भर देती है ….

    क्या बात कही है बहुत खूब……..लिखती रहे…

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  5. कुश एक खूबसूरत ख्याल कहते हैं:

    बहुत सुंदर

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  6. Udan Tashtari कहते हैं:

    चटक की “लाइन ” से गुज़र के
    जिंदगी को रौशनी से भर देती है ….

    –वाह, क्या बात है, बहुत खूब!!

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  7. jasvir saurana कहते हैं:

    मर्यादा औरत की
    ठोकर लगने पर भी हर दिन
    जिंदगी को नए मायने देती है
    चटक की “लाइन ” से गुज़र के
    जिंदगी को रौशनी से भर देती है ….
    bhut hi gahari paktiya.likhati rhe. aap apna word verification hata le taki humko tipani dene me aasani ho.

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