एक अलसायी सी दोपहर ……

ख़ामोशी कह जाती है चुप से
कानो में कुछ मीठे बोल
आओ मिल जुल के बैठे
समय बड़ा ही है अनमोल
करे मनन्न आज हम तुम
इस अलसायी दोपहर को…..

जागती आँखों में बुनते
सपनो के ताने बाने को
चढ़ने दो परवान
इश्क़ है
मिलने दो ,अनजानो को…..

उलझा दो ख़ुद को सांसो मे
रोको ना उठते तूफ़ानो को
कल का पता किसे हे मौला ,
ये पल जी लेने दो परवानो को……

एक आल्साई सी दोपहर मे
भर दो रंग सतरंगी तुम
शाम की लाली फिर निखर के
आसमान में कोई एक
इंद्रधनुष उगा जाए……

उस शाम की सुबह भी शायद
कल जल्दी से आ जाए…….

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About Gayatri

A storyteller. Poetry, fiction, Travel tales, CSR, Parenting, Images. Writing the bestseller called Life. Communication strategist. Freelance writer. Candid photographer @ImaGeees. I travel, thus I write. I write, therefore I am. Please mail at imageees@gmail.com for writing/photography assignments.
यह प्रविष्टि कविता में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

5 Responses to एक अलसायी सी दोपहर ……

  1. manya कहते हैं:

    लगता है लिखा भी खुमारी में है.. बहुत खूबसुरत…नज़ाकत से भरा….

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  2. उन्मुक्त कहते हैं:

    आज इतवार है इसी लिये अलसायी दोपहर है। कल तो काम पर जाना है टिप्पणी करते समय भी दिन के एक बज रहे हैं 🙂

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  3. परमजीत बाली कहते हैं:

    बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

    उलझा दो ख़ुद को सांसो मे
    रोको ना उठते तूफ़ानो को
    कल का पता किसे हे मौला ,
    ये पल जी लेने दो परवानो को……

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  4. Radical Essence कहते हैं:

    A perfect day-dream. Reminds me of Cliff Richard’s “The Day I met Marie”…..

    …..”Imagine a still summer’s day
    when nothing is moving,
    least of all me.
    I lay on my back in the hay
    and the warm sun is soothing;
    It made me
    feel good
    to think I know Marie….”

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  5. Udan Tashtari कहते हैं:

    बढ़िया. आजकल बहुत कम लिखा जा रहा है?

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