मेरे आईने को एक नयी तकलीफ़ लग आयी है
मेरे चहरे का मुआयना करने की ज़िद्द लगायी है
कल शिकायत थी बालो मे क्यू चान्दी उतर आयी
आज बोला कौव्वे उग रहे है आन्खो के कोनो पर
हद्द कर दी कम्बख्त ने जब बिन्दी माथे पे सजायी
बोला हया लाल रन्ग बन माथे पे क्यू सिमट आयी
सोया करो रातो मे झिड्क रहा है कुछ रोज़ से
तुम्हारी अलसायी आन्खे मुझे धुन्धली दिखती है
काजल को कोसती हो क्यू जो फ़ैलता जाता है
गलती है तुम्हारी जो नीन्दे पल्को पे सिसकती है
किसी पुराने प्रेमी सा बावरा मेरा आइना लगता है
मुझ से शुरु होकर मुझ पर खत्म दायरा उसका है
कभी सुन्दर भी बोलो हन्सते मैने प्यार से डान्टा
मासूमियत से कल का चेहरा बस्ते से उसने छान्टा
खुद से दोस्ती जो तुम कुछ बरसो पहले कर लेती
ये चहरा जिला देती रोज़ नयी नज़्म मुझसे सुनती
आईना मुझ से मेरी पहली सी सूरत मान्ग रहा था क्या कुफ़्र करता था वक़्त की रेत को साल रहा था
गुज़रा वक़्त फ़िसलती रेत है क्या ये नही जानता
कल मे सिमटा चहरा दोबारा आईना नही मान्गता
