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आइना

मेरे आईने को एक नयी तकलीफ़ लग आयी है
मेरे चहरे का मुआयना करने की ज़िद्द लगायी है

कल शिकायत थी बालो मे क्यू चान्दी उतर आयी
आज बोला कौव्वे उग रहे है आन्खो के कोनो पर
हद्द कर दी कम्बख्त ने जब बिन्दी माथे पे सजायी
बोला हया लाल रन्ग बन माथे पे क्यू सिमट आयी

सोया करो रातो मे झिड्क रहा है कुछ रोज़ से
तुम्हारी अलसायी आन्खे मुझे धुन्धली दिखती है
काजल को कोसती हो क्यू जो फ़ैलता जाता है
गलती है तुम्हारी जो नीन्दे पल्को पे सिसकती है

किसी पुराने प्रेमी सा बावरा मेरा आइना लगता है
मुझ से शुरु होकर मुझ पर खत्म दायरा उसका है
कभी सुन्दर भी बोलो हन्सते मैने प्यार से डान्टा
मासूमियत से कल का चेहरा बस्ते से उसने छान्टा

खुद से दोस्ती जो तुम कुछ बरसो पहले कर लेती
ये चहरा जिला देती रोज़ नयी नज़्म मुझसे सुनती
आईना मुझ से मेरी पहली सी सूरत मान्ग रहा था क्या कुफ़्र करता था वक़्त की रेत को साल रहा था

गुज़रा वक़्त फ़िसलती रेत है क्या ये नही जानता
कल मे सिमटा चहरा दोबारा आईना नही मान्गता

कल मिले न मिले

ज़ो खबर कल तक खास थी वो आम हो गयी
तेरी चाहते जहान मे कितनी बदनाम हो गयी
रहती थी इन्तज़ार मे जो वस्ल – ए- यार की
वो मुस्कुराहटे खुशी से क्यू अनजान हो गयी

खाली खाली पन्नो पे किस्से हज़ार बान्च्ता था
गोया दिल वो खत का लिफ़ाफ़ा क्यू बन गया
बाज़ार से निकला रिश्तो की गर्माहट को खरीद
नाते पहले बुनता रहा फिर तागो मे उलझ गया

भरी दोपहरी की गरम धूप से नहाये ये रिश्ते
थोडे खट्टे ,थोडे मीठे, थोडे अलसाये से रिश्ते
वक़्त दो ,पलने दो प्यार की ठन्डी छान्व तले
आज मे समेट लो क्या पता कल मिले न मिले

त्रिवेनी

त्रिवेनी

तुझ तक पहुन्चती भी तो कैसे

ताड से ऊन्चे कद तेरे वादो के
बौनसाई सी छोटी हसरत मेरी

ये शहर

कितना आगे निकल गया ये शहर
कितनी तन्हा मै रह गयी अकेली

इन वीरानो मे अपनी परछाईयो से
गुफ़्तगू करना भी मुश्किल है अब

यादो के साये ताड से लम्बे हो गये
और मै घट कर बौनी भर रह गयी

आदतन् …आदतन …।

कभी मै तेरी आदत से परेशान
कभी तेरी आदत मुझसे पशेमान
हमारा रिश्ता भी आदतन था न
रूठ के बिफ़र गया था उस रात

कर गया जान को रूह से जुदा …
अनजाने जब कभी जोड देती हू
तेरे नाम से अपना नाम आदतन
कह देती है रूठी रूह की धडक…।

गुमनाम से शहर के नाराज़ बाशिन्दे
चल कल के नशेमन मे वापस जा देख
वही पर बैठे है परेशानी और पशेमान
साथ मिलकर आदतन् …आदतन …।

वजूद

वजूद

चलते रहना तेरी फितरत में है
ये जानती हूँ मैं जानम कबसे
फिर भी साया बन चल पड़ती हूँ
तेरी बेरुखी की धूप के पीछे पीछे

तपिश में झुलस कर रुसवाईयो की
तेरी बे इनायती से बेजार हो रही हूँ
दिल-ऐ-बेदर्द से शिकवा कर के देखो
टूटे अरमानो का बाज़ार बन गयी हूँ

कभी तुम बे आदतन रुख से पलट जाओ
वक़्त की रेत पर लिखे कल पे पड़ लेना
बीते लम्हो की सीली रेखाए नज़र आएँगी
मेरी वफ़ा की याद तेरे वजूद को सताएंगी

तेरे वजूद से खुद को जुदा करके जानम
सायो की दुनिया से रुखसत हो रही हूँ
तेरे खयालो की धुन्द में जो खो गया था
उस अक्स को पोशीदा से रिहा कर रही हूँ

तुझ को खो,खुद को पा ,अपनी बंदगी रही हूँ

एक अजनबी की तरह

अपने ही शहर मे आये है
एक अजनबी की तरह
दबे कदमो का बोझा लिये
तेरी आहट ने भी पराया
कर दिया था यहा हमको

तू वो रहनुमा नही जिसे
मेरी निगाह तलाशे सदा
फिर क्यू दोबारा तेरी ही
चौखट पे ला खडा कर
रुसवा कर दिया हमको

सान्से चलती है अबतक
राते देर तक सुलगती है
ये ज़िन्दगी शौक नही है
बुझता जुनून है अबतक
पर सर्द आहे बुझी नही है

सिर्फ़ यादो की राख है
नासूर बन के ज़िन्दा है ।

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