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Archive for फ़रवरी, 2012

ये शहर

कितना आगे निकल गया ये शहर कितनी तन्हा मै रह गयी अकेली इन वीरानो मे अपनी परछाईयो से गुफ़्तगू करना भी मुश्किल है अब यादो के साये ताड से लम्बे हो गये और मै घट कर बौनी भर रह गयी

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कभी मै तेरी आदत से परेशान कभी तेरी आदत मुझसे पशेमान हमारा रिश्ता भी आदतन था न रूठ के बिफ़र गया था उस रात कर गया जान को रूह से जुदा … अनजाने जब कभी जोड देती हू तेरे नाम से अपना नाम आदतन कह देती है रूठी रूह की धडक…। गुमनाम से शहर के [...]

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वजूद चलते रहना तेरी फितरत में है ये जानती हूँ मैं जानम कबसे फिर भी साया बन चल पड़ती हूँ तेरी बेरुखी की धूप के पीछे पीछे तपिश में झुलस कर रुसवाईयो की तेरी बे इनायती से बेजार हो रही हूँ दिल-ऐ-बेदर्द से शिकवा कर के देखो टूटे अरमानो का बाज़ार बन गयी हूँ कभी [...]

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