अपने ही शहर मे आये है
एक अजनबी की तरह
दबे कदमो का बोझा लिये
तेरी आहट ने भी पराया
कर दिया था यहा हमको
तू वो रहनुमा नही जिसे
मेरी निगाह तलाशे सदा
फिर क्यू दोबारा तेरी ही
चौखट पे ला खडा कर
रुसवा कर दिया हमको
सान्से चलती है अबतक
राते देर तक सुलगती है
ये ज़िन्दगी शौक नही है
बुझता जुनून है अबतक
पर सर्द आहे बुझी नही है
सिर्फ़ यादो की राख है
नासूर बन के ज़िन्दा है ।

wow .. lovely thoughts.. sadness but with a purity ..
Thanks dear.
बेहद भावपूर्ण रचना बधाई हो …
आपके ब्लॉग पे पहली बार आया ..
मेरे ब्लॉग “जीवन पुष्प” पे आपका हार्दिक स्वागत है ..पधारे …
Shukriya. Zaroor, aapka blog padenge.