क्या करू कि कैसे तेरा दर्द बाँट लू मैं
दूर रह कर भी तुझे खुद से ढांप लू मैं
ग़र न उबार पाओ इस आह-ऐ-दिल को
कुछ लफ्ज़ भेज देना जिन्हें बांच लू मैं
लफ्जों में दुआओं का असर फूंक देंगे
गम जहन की परतो में दफ्न कर लेंगे
कायनात को सूखे अश्को का सबब दे
थोड़ी ख़ुशी- मुस्कराहट मोल ले लेंगे
एक बार देख लू जो तुझे जी भर हँसते
परवाह नहीं फिर तू मुझे मिले न मिले
दिल को इतनी तस्सली तो हो जायेगी
ख़ुशी तेरी जीवनसंगिनी बन जायेगी ……

बहुत अच्छी रचना ।
कृपया मेरे भी ब्लॉग में आयें ।
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