मैं जितना भी ऊंचा कूदूं
हाथ मेरे नहीं आते हो
तुम चाँद की छाती पर चढ़
आसमा में खो जाते हो
नभ के तारे दोस्त है मेरे
सब राज़ बतलाते है
जब चाँद खर्राटे लेता है
वों धरती पर आ जाते है
और मेरे घर की तख्ती पर
नाम अपना दर्ज करवाते है
जानती हूँ तुम ये छुपाते हो
तारो संग तुम भी आते हो
जैसे ही मैं हाथ बढाती हूँ
तुम नभ में उड़ जाते हो
तारो संग आँखमिचोली खेल
मेरे दिल को तडपाते हो
आसमा में उड़ते जाते हो
गुरुत्वाकर्षण रूल भुलाते हो

गायत्री जी ,
बहुत ख़ूबसूरत !
Shukriya Manish.
behad khoobsurat .. superlikes..
wow just wow गुरुत्वाकर्षण रूल भुलाते हो
Thanks so much Anu . Appreciate your comment , you lovely poetess